Saturday, April 23, 2016

मां का दर्द और भारत माता की जय

आप एक महिला के दर्द को महसूस नहीं कर सकते लेकिन आप भाषणों में कहते हैं एक महिला की प्रसव पीड़ा के समय जो दर्द होता है उसे मर्द झेल नहीं सकते। मैं आपके साथ हूं, मेरा मानना है कि उस दर्द को झेलने वाली महिला का सीधा संबन्ध हमसे या तो एक मां के रूप में हो सकता है या फिर एक पत्नी के रूप में हो सकता है। अब चूंकि पत्नी हमारे जीवन में बाद में आती है या नहीं भी आती है तो भी मां का संबन्ध तो सभी से होता है। इसलिए हमने इस भारत को मां माना। ‘मां’ शब्द को इस देश की संस्कृति से जोड़कर देखिए तभी इसका मर्म समझ में आएगा।

‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के साथ समानता के भाव का जागरण होता है। एक बार कल्पना कर के देखिए, जिस जातिवाद से आप आजादी चाहते हैं उसी जातिवाद के निवारण के रूप में यह उद्घोष कितना काम आएगा। कोई भेदभाव नहीं, एक ही मां के सभी बेटे, कोई जाति-धर्म नहीं, किसी पूजा-पद्धति की बंदिशें नहीं, आखिर मां तो हर पूजा-पद्धति को मानने या न मानने वालों की होती है। ऐसी समानता किसी और तरीके से आ सकती है। इस विषय पर आप संघ को गाली भी नहीं दे सकते क्योंकि जातिगत विषय जमीनी स्तर पर कम से कम संघ में तो नहीं दिखते।

आदत

हर किसी की कोई ना कोई अच्छी आदत होती है.... . . .
मेरी "तुम" हो...!! #क्वीन

प्रेम की किताब

अभी तो 'प्रेम की किताब' लिखनी ही शुरू की थी,
ना जाने परीक्षा के परिणाम कैसे आ गए। #क्वीन

प्रेम और आध्यात्म

प्रेम, प्रदर्शन का नहीं बल्कि आध्यात्म का विषय है। यह बात तब तक महसूस नहीं की जा सकती जब तक आप प्रेम को हृदय की गहराइयों से महसूस ना करें।

कोशिश

कोशिश आखिरी सांस तक करनी चाहिये..!!
'मंजिल' मिले या 'तजुर्बा', चीजें दोनों ही नायाब हैं..!! #QUEEN

कैसा प्रेम तुम्हारा था

प्यार जताकर दूर गई तुम, कैसा प्रेम तुम्हारा था
तुमको खोकर खुद को पाया, क्या एहसास तुम्हारा था
पागल कहकर क्यों ठुकराया, कैसी आस तुम्हारी थी
गले लगाकर दूर हटाया, कैसी प्यास तुम्हारी थी
तुमसे मिलकर बातें करना, कैसी चाहत मेरी थी
आँखों में भी पानी था, फिर कैसी हसरत मेरी थी #क्वीन

उसे ही फुरसत ना थी

उसे ही फुरसत ना थी किसी अफ़साने को पढ़ने की
मैं तो बिकता रहा उसके शहर में अखबारों की तरह...
#क्वीन